सीमाओं के भीतर भावनाओं को पोषित करना सदा से ही मुश्किल काम है क्योंकि कुछेक भावनायें मनुष्य के विशालतम मस्तिष्क के बंधन से मुक्त होकर, कोमल लघु ह्रदय की दासी हो जाना पसंद करती हैं. ऐसी ही एक भावना का नाम हैं राष्ट्रवाद। एक शब्द जिस पर बहस की लम्बी प्रक्रिया को मैं दोहरा सकती हूँ लेकिन उस मानवीय स्वभाव से ग्रसित हूँ जो बरसों पहले मेरे पूर्वजों के डीएनए से मुझे मिला। मानवीय स्वभाव, जो पहले समय में रोटी पानी की खोज में राष्ट्र की सीमाओं और संस्कृति को उलाँघता था और आजकल बौद्धिक तुष्टिकरण के लिए किसी एक राष्ट्र का होना नहीं स्वीकारता। यहाँ ये स्पष्ट करना जरुरी है कि किस बौद्धिक तुष्टिकरण की बात हो रही है दरअसल प्रारम्भिक आधुनिक (early modern) सामाजिक इतिहास के प्रभाव से बचकर ही इसे समझा जा सकता है. क्योंकि राष्ट्रवाद की धारणा उस काल में हावी होते विस्तारवाद की देन है. अपनी साझी संस्कृति, धर्म और भाषा को बचाये रखने की सकारात्मक पहल हुई तो इसे राष्ट्रवाद नाम दिया गया. लेकिन समय के साथ इसका स्वरुप कट्टर और असहिष्णु होता चला गया. एक लंबा समय बीतने के बाद आज हम राष्ट्रवाद को विश्वग्राम की परिकल्पना में बाधा के तौर पर स्पष्ट रूप से देख सकते हैं. ये ना तो हमारी पौरणिक धारणाओं से मेल खाता है और ना ही विकसित विज्ञान की उस वास्तविकता से जो पृथ्वी पर मनुष्य-विकास के अध्ययन से स्थापित हुई है. राष्ट्रवाद जहाँ एक और वसुधैव कुटुंबकम की भावना को दबाता है वहीँ दूसरी ओर जनजातियों की आपसी निर्भरता पर भी नैतिक प्रश्न उठाता है.  

पृथ्वी जब से अस्तित्व में हैं तभी से कई बड़े परिवर्तनों का साक्षात्कार करती रही है. ये परिवर्तन भौगोलिक भी है और सामाजिक भी. आज तक ना जाने कितने भूकंप आये और ना जाने कितने ग्लेशियर पिघल कर जलनिधि का अवतार ले चुके हैं. यह भी ज्ञात करना मुश्किल है कि कौन सी मानव जाति ने पूरी धरती पर कहाँ से कहाँ तक भ्रमण, व्यापार, विचरण और विस्थापन किया है. अगर हमारी मानसिक स्थिति ये कहती है की राष्ट्रवाद हर एक नागरिक का नैतिक कर्तव्य है तो हमें ये स्वीकारने में भी संकोच नहीं होना चाहिए कि जो आज हमारी सीमा के अंतर्गत आता है वो पहले किसी और का था. सम्भावना ये भी हैं कि आज जो हमारी संस्कृति बची हैं उसमें विपरीत सभ्यताओं की मिलावट हो. जिस तरह किसी अप्राप्य की आपूर्ति के लिए हमारे पूर्वज इस विशेष भूखण्ड पर आ बसे होंगे, उसी तरह अन्य सम्प्रदाय और जनजातियाँ भी अपनी स्थिति के चलते इस भूखण्ड पर शरणार्थी रही हैं. राष्ट्रवाद के मामले में हमें पुनर्विचार करने की जरुरत है क्योंकि गर्व और घमण्ड के बीच भारी अंतर होता है. अर्जित और अविष्कृत वस्तु का फर्क समझने के लिए इतनी व्याख्या काफी है.