सियाचिन दुनिया का सबसे ऊंचा और मुश्किल वॉरजोन माना जाता है. करीब 21,700 फ़ीट की ऊंचाई पर सिय‍ाचिन ग्‍लेशियर में तैनात भारतीय जवानों को कई तरह की मुश्किलों का सामना करना पड़ता है. यहां सैनिकों को साल के 12 महीने बर्फ़ में रहकर देश की रक्षा करनी होती है. इस दौरान यहां का तापमान इतना कम होता है कि इंसान का ख़ून तक जम जाएं.

नहाने के लिए 90 दिनों का इंतज़ार खत्म

ऐसे में सोलर्जर्स को कई तरह की सावधानियां बरतनी पड़ती हैं. इस दौरान उनको नहाने के लिए कम से कम तीन महीने यानि कि 90 दिनों का इंतज़ार करना पड़ता है लेकिन अब हमारे ये सोलर्जर्स वीक में 2 बार नहा सकेंगे. सियाचिन में तैनात इन सोलर्जर्स को अब ऐसे प्रॉडक्‍ट्स दिए जाएंगे जो पूरी तरह से वॉटरलेस होने के साथ-साथ हाईजीनिक भी है. इस ‘वॉटरलेस बॉडीवॉश’ के इस्तेमाल से जवान हफ़्ते में कम से कम दो बार नहा सकेंगे. सिर्फ 20 ML जेल से पूरी बॉडी को वॉश किया जा सकेगा.

ग्लेशियर में तैनात रहते हैं 3,000 सैनिक

अधिकारियों के मुताबिक़, इस वॉटरलेस बॉडीवॉश को आर्मी डिज़ाइन ब्‍यूरो (एडीबी) ने बनाया है. वहीं दिल्‍ली आईआईटी ने जवानों के लिए हाइजीन प्रोडक्ट्स भी तैयार किये हैं. आपको बता दे कि सैनिकों को तीन महीने यानी 90 दिन के लिए सियाचिन में तैनात किया जाता है. सियाचिन के 21,700 फीट की ऊंचाई पर होने के कारण वहां पानी बहुत मुश्किल से ही मिल पाता है. सियाचिन ग्लेशियर में हर समय तीन हजार से ज्यादा सैनिक तैनात रहते हैं और वहां पर तापमान -60 डिग्री से भी नीचे तक चला जाता है. सियाचिन पर करीब 05-07 करोड़ हर रोज खर्च किए जाते हैं. 100-100 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से सियाचिन पर आते हैं बर्फीले तूफान. इस्ट में चाइना की सीमा लगती है और वेस्ट में पाकिस्तान की, यंहा हर तरफ रहता है मौत का खतरा.

हर वक्त निगरानी में रहते हैं सैनिक

आए दिन होने वाले स्नोस्लाइड, मेटल बाइट, ज्यादा हाइट पर होने वाली बीमारियों के साथ सांस रुकने और हडि्डयों को गला देने वाली बर्फबारी के बीच जवानों का सियाचिन में रहना अपने आप में बहुत बड़ी बात है. आपको शायद ये बात पता नही होगी की सियाचिन में रहने वाले जवानों पर पूरी निगरानी रखी जाती है ताकि उन्हे कोई बिमारी ना हो. उनको पूरी गाइड लाइन दी जाती है कि वो अपने कपड़े कब बदले, टावल परेड कब करें. सैनिको को कपड़ों की कई तह पहननी पड़ती हैं और सबसे ऊपर जो कोट पहनते हैं उसे “स्नो कोट” कहते हैं. इस तरह मुश्किल हालात में कपड़ों का भी भार सैनिकों को उठाना पड़ना है. यंहा टेम्प्रेचर इतना ज्यादा होता है कि एक बार अगर आपकी स्कीन पर छोटी सी भी चोट लग जाए तो वो घाव बिल्कुल भी आसानी से नही भरेगा. यंहा तक की रात में टेंट में सोते समय हर एक घंटे में एक जवान को जगाया जाता है ताकि कम ऑक्सीजन के कारण कोई मर न जाए. रोजाना 300-400 जवानों की मेडिकल की जाती है.

हेलिकॉप्टर की अहम भूमिका

सियाचिन के रण क्षेत्र में पोस्ट पर तैनात होने से पहले भारतीय सेना के जवानों को तीन हफ्ते की टफ ट्रेनिंग दी जाती है. ट्रेनिंग पूरी होने के बाद फारवर्ड पोस्ट तक पहुंचने में सोलर्जर्स को दस दिन का वक्त लगता है. पोस्ट पर जाते ही जवानों की पूरी लाइफ स्टाइल चेंज हो जाती है. सनराइज होते ही सबसे पहले टेंट में रहने वाले छह सात जवानों के लिए पानी का इंतजाम किया जाता है. इसके लिए 30 से 35 किलो बर्फ लाकर उसे गर्म करते है, तब जाकर 17 से 18 लीटर पानी बनता है. इस पानी में टेबलेट डालकर पीने के लिए बनाया जाता है. जवानों के लिए पोस्ट पर राशन पहुंचाने, रेस्क्यू करने में और
सर्च ऑपरेशन में हेलिकाप्टर ही अहम भूमिका निभा रहे हैं. यहां आर्मी एविएशन कोर के हेलिकॉप्टर तैनात हैं. आपको बता दे कि भारत उन कुछ देशों में से एक है, जो इतनी ऊंचाई पर हेलीकॉप्टर का इस्तेमाल करता हैं. इंडियन आर्मी द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले चीता और चेतक हेलीकॉप्टर 23 हजार फीट की ऊंचाई तक उड़ान भरते हैं.