देश भर में लोकसभा चुनाव का असर देखने को मिल रहा है और साथ ही उम्मीदवारों द्वारा एक दूसरे पर कीचड़ उछालने का सिलसिला भी ज़ारी हैं. राजनीति में स्वार्थसिद्धि की कोई सीमा निर्धारित नहीं है। इसलिए सत्ताधारियों को घरेलू राजनीति से ऊपर उठकर जनहित के बारे में सोचने का समय नहीं मिलता। अक्सर हमारे नेतागणों की ज़बान फिसलती रहती है। इनके गैरजिम्मेदार बयान कभी धार्मिक भावनाओं को चोट पहुँचाते है तो कभी स्त्रियों के स्वाभिमान को ललकारते हैं। ताज़ा मामला आजम खान का है जिन्होंने रामपुर से भाजपा प्रत्याशी जयाप्रदा को लेकर स्त्री विरोधी बयान जारी किया है. लेकिन ये पहला मामला नहीं है जब किसी राजनीतिज्ञ ने सरेआम किसी महिला पर निशाना साधा है. पॉलिटिक्स में महिलाओं के अपमान के मुद्दे उठते रहते हैं. चलिए आपको याद दिलाते हैं कि इससे पहले भी हमारा लोकतंत्र ऐसी शर्मनाक बयानबाज़ी का गवाह रह चुका हैं –

जब संजय निरुपम ने कहा स्मृति ईरानी को ठुमके लगाने वाली –

बात है 20 दिसम्बर सन 2012 की. ABP न्यूज़ पर एक पॉलिटिकल डिबेट चल रही थी और कांग्रेस के सांसद संजय निरुपम ने नव निर्वाचित स्मृति ईरानी की बात सुनने से इंकार कर दिया। संजय ने कहा कि “आपने अभी चार दिन पहले राजनीति ज्वाइन की है इसलिए आप मुझे राजनीतिक समीकरण ना समझायें तो अच्छा होगा। कल तक टीवी पर ठुमके लगाने वाली आज कैबिनेट की मंत्री बन बैठी हैं.”

बसपा नेता राजपाल सिंह बोले लड़कियों को मोबाइल ना दें-

22 अक्टूबर 2012 में बसपा नेता ने उत्तर प्रदेश में सार्वजनिक रूप से बयान दिया था कि “बच्चों और महिलाओं को मोबाइल फ़ोन बिलकुल ना दें. उन्हें मोबाइल फोन की कोई जरुरत नहीं हैं. मोबाइल महिलाओं का काम से ध्यान भटकाता है. जब हमारी माताओं और बहनों के पास मोबाइल नहीं थे तब भी वो जिन्दा थीं. “

मुलायम को नहीं चाहिये रेप पर कड़ा कानून –

मुरादाबाद में 2014 इलेक्शन में प्रचार के दौरान सपा नेता मुलायम सिंह यादव ने पुरुष मतदाताओं को लुभाने के लिए एक बड़ा भद्दा बयान दे डाला था. उन्होंने कहा थी कि एक उम्र में लड़कों से गलतियाँ हो जाती है इसलिए रेप के लिए फांसी जैसी कड़ी सजा का प्रावधान नहीं होना चाहिए। उन्होंने ये भी कहा था लड़कों और लड़कियों के बीच ज्यादातर सम्बन्ध दोस्ती के कारण सहमति से बनते हैं. 

मायावती को सुनना पड़ा भयानक शब्द –

बीजेपी के पूर्व उत्तर प्रदेश उपाध्यक्ष दयाशंकर सिंह को बीएसपी सुप्रीमो मायावती के खिलाफ अभद्र टिप्पणी करने के कारण बीजेपी से 6 साल के लिए निकाला जा चुका है.  दयाशंकर ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को सम्बोधित करते हुए कहा था की ”एक वेश्या पैसा लेने के बाद एक आदमी को दिया वचन पूरा करती है लेकिन मायावती, यूपी में एक ऐसी बड़ी नेता हैं जो टिकट बेचने में वेश्या को पीछे छोड़ रहीं हैं. वो एक करोड़ रुपये लेने के बाद भी टिकट दो करोड़ देने वाले उम्मीदवार को देती हैं.”

आजम खान ने दिखाई मर्दानगी की धौंस –

अभी हाल ही में आजम खान की जुबान फिसली है. चुनावी माहौल में दूसरे उम्मीदवार की कमी निकालते निकालते ये जनाब स्त्री के आत्मसम्मान को भूल बैठे। गठबंधन की ओर से रामपुर से चुनाव लड़ रहे आजम ने अपनी प्रतिद्वंदी जयाप्रदा (BJP) पर निशाना बनाते हुए कहा कि ”जिसको हम उंगली पकड़कर रामपुर लाए, आपने 10 साल जिनसे प्रतिनिधित्व कराया, उसकी असलियत समझने में आपको 17 साल लगे, मैं 17 दिन में पहचान गया कि इनका अंडरवियर खाकी रंग का है.”

वास्तविक मुद्दों की कमी के चलते हमारी मीडिया भी ऐसे अर्थहीन बयानों को अतिरिक्त तवज्जो देती है। लगता है आजकल राजनेताओं के काम कम और विवादित बयान ज्यादा हैं। देश की गरिमा को बनाये रखने का जिम्मा जनता ने जिन्हें सौंपा है वो लोग अपने बयानों से पद की प्रतिष्ठा तक संभालने में असक्षम हैं। हमारा ये विचार है की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रयोग लोकतंत्र की छवि बिगाड़ने में नहीं होना चाहिये।